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Langadi Sarkar Ke Liye Taiyar Rahiye

 
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ला लू यादव ने दरभंगा की जनसभा में जो कुछ कहा, उसके गहरे संकेत हैं। उन्हें लगता है कि कांग्रेस की वापसी नहीं होने जा रही। उनके बयान से साफ है कि परिणाम आने के बाद वे यूपीए का हिस्सा नहीं रहेंगे। एेसा लगता है कि बिहार ही नहीं, देश भर से आने वाले नतीजों का उन्हें आभास हो चला है। उनकी पार्टी का आधार खिसक रहा है और कुछ सीटों पर मुस्लिम वोटर कांग्रेस को भी वोट कर सकता है। कुछ और बातें भी साफ हो गयी हैं। अब तक तो यह केवल चर्चा थी लेकिन बाबरी विध्वंस के लिए कांग्रेस को भी जिम्मेदार ठहराने संबंधी लालू के बयान से साफ हो गया है कि वे और मुलायम सिंह बिहार और यूपी में कांग्रेस को संभलने का मौका नहीं देना चाहते। वे जानते हैं कि वे कांग्रेस की कीमत पर ही आगे बढ़े हैं। यादव-मुस्लिम समीकरण ने इन दोनों को राजनीतिक ताकत दी है। बिहार में जहां नीतीश कुमार की तेज हवा में लालू की लालटेन बुझने की आशंका है, वहीं उत्तर प्रदेश में मायावती का हाथी मुलायम की साईकिल को रौंदता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ता नजर रहा है। लालू और मुलायम की राजनीति अब कुछ-कुछ समझ में आने लगी है। प्रत्यक्ष तौर पर वे भले ही यूपीए में बने रहकर मनमोहन सिंह को ही दोबारा प्रधानमंत्री बनवाने की बात कर रहे हैं, हकीकत यह है कि कांग्रेस को कमजोर कर वे इतनी ताकत जुटा लेना चाहते हैं कि तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की सूरत में मायावती की जरूरत ही नहीं रहे। एक सोची समझी रणनीति के तहत ही इन दोनों ने कांग्रेस से तालमेल को सिरे नहीं चढ़ने दिया। एेसा नहीं होता तो मुलायम अमर सिंह के जरिए कांग्रेस पर तीखे हमले नहीं करा रहे होते और लालू बिहार की जनसभाओं में बाबरी विध्वंस के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए नजर नहीं आते।

लोकसभा सीटों के लिहाज से उत्तर प्रदेश और बिहार देश के सबसे बड़े राज्यों में गिने जाते हैं। इन राज्यों से ही लोकसभा के लिए 120 सांसद चुनकर आते हैं। जिस तरह के हालात हैं, उनमें कांग्रेस का बिहार में इस बार खाता भी नहीं खुलेगा और उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें 2004 के मुकाबले बढ़ने के बजाय और कम होने की आशंका है। 2004 में उसे बिहार में 40 में से 3 और यूपी में र्Üिं0 में से 9 सीटें नसीब हुई थीं। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से भी कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है। इन दो बड़े राज्यों से लोकसभा के लिए 81 सांसद आते हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस की सहयोगी डीएमके की इस बार खस्ता हालत है। इसलिए कांग्रेस को भी नुकसान तय है। जो सर्वे आए हैं, उन पर भरोसा करें तो तमिलनाडु की 39 में से कांग्रेस को दो-तीन सीटें ही मिलेंगी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के साथ चुनाव मैदान में उतरी है। इससे वाम मोर्चा की सीटें घटेंगी, लेकिन कांग्रेस को इससे ज्यादा लाभ नहीं मिलता दिख रहा। वहां ममता की सीटें बढ़ेंगी। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश से कांग्रेस नेता ज्यादा उम्मीदें नहीं पाल रहे हैं। दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल जसे छोटे राज्यों में भी उसकी ताकत घटेगी। गुजरात और महाराष्ट्र से भी उसे बढ़कर सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है।

जिन राज्यों में कांग्रेस की ताकत बढ़ सकती है, उनमें राजस्थान, उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और केरल हैं। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में तीसरे मोर्चे की ताकत बढ़ती नजर रही है। वाम मोर्चा हालांकि पश्चिम बंगाल और केरल में अपनी जमीन खोता दिख रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह तीस से अधिक लोकसभा सीटें जीत कर तीसरे मोर्चे को ताकत देगा। जिस तरह के राजनीतिक हालात बन रहे हैं और देश भर से सूचनाएं रही हैं, उससे लग रहा है कि कांग्रेस की सीटें 2004 के मुकाबले घट सकती हैं। तब उसे 145 सीटें मिली थीं। भाजपा की सीटों की संख्या 138 थी। 2004 के चुनाव में भाजपा को 1999 के मुकाबले काफी कम सीटें मिली थीं। ऊपर से उसके गठबंधन सहयोगियों का प्रदर्शन भी काफी खराब रहा। इस बार भाजपा पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के बिना चुनाव लड़ रही है। लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राजग निर्णायक नेता और मजबूत सरकार देने के वादे के साथ मैदान में है। भाजपा के पक्ष में

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